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बाग-बगीचों का खत्म हो जाना

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गर्मी बढ़ रही है और धरती तप रही है। लू के थपेड़े हमें घरों में कैद होने को विवश कर रहे हैं। यह जानलेवा गर्मी गरीबों के लिए सबसे ज्यादा कष्टदायी है, क्योंकि उन्हें तो काम के लिए हर हाल में घर से बाहर निकलना ही है। उनके सुस्ताने के लिए बाग-बगीचे नहीं रहे। पशु-पक्षी की परवाह हम कम ही करते रहे हैं, अब मनुष्य की भी परवाह नहीं करते। रोज बढ़ रही गर्मी से बचने का कोई उपाय भी हमारी चिंता में नहीं है।

नदी-नाले सूख रहे हैं। हवा की तपन को नियंत्रित करने वाले बड़े़-बड़े बाग-बगीचे और झाड़ियों को हमने निर्दयतापूर्वक समाप्त कर दिया है। ताल-तलैयों के प्रति जो नीति रही, उससे अब न गांवों में बारहों महीने पानी वाले तालाब बचे हैं और न झीलें बची हैं। शहरों में सीमेंट के जो जंगल खड़े किए गए, उसने हरियाली खत्म कर दी। बड़े-बड़े कॉलोनाइजरों ने बेरहमी से बागों, तालाबों और झीलों को खत्म किया।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद हर शहर में तालाबों को पाटकर और बागों को काटकर कॉलोनियां विकसित की गईं। पहले ज्यादातर बाग सामंतों और राजा-रजवाड़ों ने लगवाए थे। सारी जमीन पर कब्जा उन्हीं का था,  इसलिए बड़े-बड़े बाग लगाने की क्षमता भी उन्हीं के पास थी। लखनऊ, बंगलूरू, देहरादून, जयपुर आदि बागों के शहर थे। लखनऊ के ज्यादातर इलाकों के नाम बागों के नाम पर रखे गए थे। इलाहाबाद, रांची आदि बागों से आच्छादित शहर थे।

बागों से तापमान का कैसा रिश्ता होता है, इसे समझने के लिए हमें देहरादून के वर्तमान को देखना होगा। कभी पूरा देहरादून शहर बागों से ढका रहता था। लीची के मशहूर बाग और हरे-भरे पेड़ शहर की शोभा बढ़ाते थे। बीती सदी के साठ के दशक तक बने देहरादून के मकानों में पंखों का प्रावधान नहीं होता था।

ढाई बीघे के प्लॉट में एक छोटा मकान बना होता, शेष में बाग और फूल-पौधे होते थे। गर्मियों में एक-दो दिन गर्मी पड़ती और अगले दिन बारिश से मौसम सुहाना हो जाता। आज स्थित बदल चुकी है। पूरा राजपुर रोड शॉपिंग कॉम्प्लेक्स से भरा पड़ा है। पेड़ गायब हो चुके हैं और दिन का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार कर रहा है।

आखिर हमारे विकास मॉडल में कुछ तो खोट है, जो प्रकृति को नष्ट कर धरती का तापमान बढ़ा रहा है। धरती पर जीव का अस्तित्व इसके ठंड़ा होने से ही संभव हुआ था। अब अगर धरती फिर तपती जा रही है, तो निश्चय ही धरती से जीवों के खत्म होने का समय करीब है।

वाहनों की बढ़ती संख्या और घरों में लगे एसी भी गर्मी बढ़ा रहे हैं। हरे-भरे बागों और जंगलों में गर्मी को नियंत्रित करने और मानसून को बरसने के लिए बाध्य करने की जो क्षमता होती थी, वह अब नहीं रही। बगीचों से गुजरती गर्म हवा, पेड़ों के पत्तों को छूकर ठंड़ी हो जाती थी। पत्तियां तापमान को नियंत्रित करती थीं। आज हम धरती को बेपर्दा करते जा रहे हैं। नंगी धरती की हवा रूखी-सूखी हो गई है। गर्मी को नियंत्रित करने के लिए बाग और तालाबों का जो महत्व समाज में पहले था, हमने उसे नकार दिया। हमारे लोकगीतों में भी बागों और तालाबों का काफी जिक्र हुआ है।

गर्मी बढ़ाने और बाग-बगीचों को नष्ट करने में हमारी तथाकथित विकास नीतियां और कॉरपोरेट की धनलिप्सा जिम्मेदार है, क्योंकि प्रकृति का भोग वही अधिक करता है। उसने अपने लिए हर चीज वातानुकूलित बना ली है। जब तक इन नीतियों की समीक्षा नहीं होगी, तब तक गर्मी बढ़ेगी और धरती झुलसती रहेगी।

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